*धर्म आध्यात्म-किन लोगों का चरण स्पर्श वर्जित माना गया है*

*धर्म आध्यात्म-किन लोगों का चरण स्पर्श वर्जित माना गया है*

मालिनी सिंह जी की कलम से....

हमारी संस्कृति के मूल में बसे हैं संस्कार। बड़ों को प्रणाम करना, नमस्ते करना या उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना। ऐसा करना हमारे घरों में बचपन से सिखाया जाता है। लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनमें हमें प्रणाम करने और चरण स्पर्श करने से बचना चाहिए।

चरण स्पर्श करने का भी विधान है। ऐसे व्यक्ति के चरण स्पर्श नहीं करने चाहिए, जो सो रहा हो। ऐसा करना वर्जित माना गया है। क्योंकि हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, लेटे हुए व्यक्ति के पैर केवल एक ही स्थिति में स्पर्श किए जा सकते हैं, जब उसकी मृत्यु हो चुकी हो। विवाहित पुरुष को अपनें सास ससुर के पैर नहीं छुने चाहिए,एक पिता को चाहिए की वो अपने पुत्री के पैर छुए लेकिन बेटी को पिता का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए,मामा मामी के चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए, भतीजे को चाची के चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
शास्त्र सम्मत यह है कि मामा मामी,को भांजा और भांजी के चरण स्पर्श करने चाहिए,चाची को भतीजी और भतीजा का चरण स्पर्श करना चाहिए।साथ ही सास और ससुर को अपनें पुत्री और दामाद के दंडवत होकर चरण स्पर्श करने चाहिए।

श्मशान से लौटते हुए व्यक्ति को
श्मशान से लौटते हुए व्यक्ति को प्रणाम करना वर्जित माना गया है। इसका कारण मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक है। श्मशान से लौटते समय व्यक्ति की मनोदशा सामान्य से अलग होती है। उस स्थिति में वह हृदय और मन से व्यथित और अस्थिर भी होता है। काफी हद तक उसका सांसारिक मोह से उस समय भंग हो चुका होता है। ऐसे में वह खुश होकर आशीर्वाद नहीं दे पाता है।

जब इस अवस्था में हो व्यक्ति
जब कोई व्यक्ति ध्यान कर रहा हो तो उसे प्रणाम नहीं करना चाहिए। पूजा करते हुए व्यक्ति को भी प्रणाम नहीं करना चाहिए। ऐसा करने के पीछे कारण यह है कि आपके प्रणाम करने से उसका ध्यान भंग होगा और आपको आशीर्वाद मिलने की जगह दोष लगेगा।

ऐसे कभी प्रणाम न करें
प्रणाम हमेशा दोनों हाथों को जोड़कर करना चाहिए। एक हाथ से प्रणाम करना उचित नहीं होता है। जब हम दोनों हाथों को मिलाकर प्रणाम करते हैं तो हमारी हथेलियों में बने एक्यूप्रेशर पॉइंट्स में रगड़ होती है और दबाव पड़ता है। इससे हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसलिए हाथ जोड़कर प्रणाम करने में हमारे शरीर को भी लाभ मिलता है।

पैर छूने का यह है सही तरीका
आज-कल एक चलन देखने को मिलता है। लोग अपने से बड़ों के पैर केवल एक हाथ से स्पर्श करते हैं…ऐसा करने पर आपको पूरा लाभ नहीं मिलता। यहां दुआओं की बात नहीं हो रही है बल्कि बात हो रही है, उस ऊर्जा चक्र की जो एक हाथ से चरण स्पर्श करने पर पूरा नहीं हो पाता। दरअसल, पैरों को शरीर की ऊर्जा का संग्रह माना जाता है। जब हम दोनों हाथों से बड़ों के पैर छूते हैं तो उनके दोनों पैर और हमारे हाथों को मिलाकर एक ऊर्जा चक्र पूरा होता है।

शास्त्रों में लिखा है कि-

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श करता है। उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है।

पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है, यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता, बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। आमतौर पर तीन तरीकों से पैर छुए जाते हैं। पहला तरीका- झुककर पैर छूना। दूसरा तरीका- घुटने के बल बैठकर पैर छूना। तीसरा तरीका- साष्टांग प्रणाम करना।

झुककर पैर छूना– झुककर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है।

घुटने के बल बैठकर पैर छूना- इस विधि से पैर छूने पर हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।

साष्टांग प्रणाम– इस विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा, झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।

पैर छूने के तीसरे तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार खत्म होता है। किसी के पैर छूने का मतलब है उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार खत्म हो जाता है। 


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