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*देश का पैगाम किसानों के नाम-श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी*

देश का पैगाम किसानों के नाम......

किसान जागो, संगठित हो और हमारे जीवन को संरक्षित करो, क्योंकि फैक्टरियां और व्यापारिक प्रतिष्ठान हमें लाखों बीमारियों की सौगात देने को उतारू हैं।

किसान 6 से 8 महीने तक कड़ी मेहनत करके, 150 रुपये किलो में बीज लेकर राहर बोता है। खराब मौसम से बचकर कुछ उत्पादन कर भी लेता है तो उस राहर को ₹40-60/KG में बेचने को मजबूर रहता है जबकि व्यापारी वर्ग उसे एक दिन के मशीनी मेहनत के बाद ₹125/KG में बेचता है। किसानों थोड़ा समीक्षक बनो, पिछले साल राहर दाल का जो अधिकतम मूल्य था उसके 75% से कम मूल्य में राहर मत बेचो..... जागो और संगठित हो जाओ, आप मंडी या दुकान में जितना अधिक भीड़ लगाकर बेचोगे, आपके राहर उतने ही सस्ते दामों में बिकेंगे..... आराम से बेचना, बचाकर रखो.... दुकान या मंडी में बेचने के बजाय मील से या जतवा से दाल बनाकर, दाल को केमिकल से केंसर और शुगर कारक बनाये बिना स्वयं सड़क किनारे दुकान लगाकर ग्राहकों को बेचना, ताकि आम आदमी रोगमुक्त जीवन को प्राप्त करें और आपको अच्छे दाम मिले। आम जनता को लुटेरे दलालों से बचाएं।

मैंने ऊपर जो राहर के बारे में कही वह केवल राहर के लिए नहीं बल्कि लगभग सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों के लिए बता रही हूँ। आप चावल, गेंहू और अन्य सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों के रखरखाव की समीक्षा करेंगे तो समझ मे आएगा कि आप जिसे पौष्टिकता और जीवन की रक्षा के लिए खा रहे हैं वह आपको ढेरों बीमारियों की सौगात देने वाली है। हम किसान अपने घरों में धान, गेंहू, राहर, चना इत्यादि को लंबे दिनों तक रखने के लिए खासकर बीज के रूप में रखते है तो उसमें नीम पत्ते, प्याज इत्यादि डालकर उसे घुन इत्यादि से बचाते हैं, अब कैमिकल प्रोसेस के माध्यम से उसी खाद्य पदार्थों में जहरीले केमिकल मिलाया जा रहा है, ताकि अनाज के एक दाने भी खराब या बर्बाद न हो चाहे आप खाने वाले उसे खाकर जल्दी मरने योग्य होते जाएं।

हम ग्रामीणों और किसानों को बड़ी समस्या होती है अपने खाद्य पदार्थों की सुरक्षा में। आप जिस चावल, राहर और अन्य खाद्य पदार्थ को बाजार या दुकान से खरीदते हैं उसमें कैमिकल डालकर सुंदर बनाया गया है, चिकना बनाया गया है ताकि आप देखकर आकर्षित हो सकें। यदि आपने धान या दाल की मिलिंग नहीं देखी होगी तो जरूर देखिए जिस अनाज को आप दोगुने दाम देकर खरीद रहे हैं वह जहरीले पदार्थों की लेप से लिपटी हुई है जो आपको भयावह बीमारियों से ग्रसित करने वाली है।

बचपन में हमारा परिवार लगभग 3 हेक्टेयर जमीन में गन्ना किसानी करके उसका गुड़ बनाने का काम करता था, गुड़ को थोड़ा साफ और चमकदार बनाने के लिए पुटू, एक प्रकार का भिंडी के तने के छिलके डालकर गन्ना रस से उसका कालापन निकालते थे, मगर अब ऐसा नहीं है टोटल कैमिकल प्रोसेस होने लगा है। मेरे दिमाक में एक निर्देश हमेशा से, बचपन से सुरक्षित है... शक्कर बीमारियों का कारक है जबकि अब जिस पद्धति से सुंदर दिखने वाले गुड़ बनाकर आपको खिलाया जा रहा है वह भी आपके साथ धोखा है, इसके माध्यम से आपको सैकड़ों बीमारियों की सौगात दी जा रही है। इसका बड़ा कारण है ईंधन बचाने और कम गन्ने में अधिक गुड़ बनाने की होड़। अब जो ग्रामीण क्षेत्रों में गुड़ की फैक्टरी लग रही है वह भी केमिकल और बीमारियों से युक्त है, भोज्य पदार्थों में जितना अधिक व्यापारिक इन्वॉल्वमेंट होगा ग्राहकों को उतने अधिक दाम में उपलब्ध होते हैं, भोज्य पदार्थ और राशन जितना अधिक दिनों तक व्यापारिक प्रतिष्ठान में रहेंगे उतने अधिक रोगकारक और केमिकल युक्त होंगे। इसलिए हे भगवान, हे किसान आपसे प्रार्थना है अनाज का थोक विक्रय मत करो क्योंकि ये लोग हमें बीमारियों से मारने और लूटने को उतारू हैं आपके मेहनत में केवल दलाली करने वाले हैं। आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है, थोक के बजाय फुटकर बेचो, अपने घर मे फिर से कोठी बनाओ, खेत से सीधे बोरी भरकर मत बेच दो... हमारी रक्षा करो...हमारी प्राण बचाओ।

पुनः आपसे निवेदन है कि परंपरागत कृषि पद्धति को छोड़कर थोड़ा व्यापारिक बनिए.. स्थानीय मार्केट में मांग के अनुरूप ही अनाज का उत्पादन करिए; हमारे जीवन और पेट भरने के साथ साथ थोड़ा अपने आर्थिक स्थिति में सुधार भी करिए। थोड़ा संगठित हो जाओगे, जागरूक हो जाओगे तो आत्महत्या के लिए मजबूर नही होओगे, ख्याल रखना मनुष्य के जीवन ले लिए हवा और पानी के बाद जो सबसे आवश्यक है वह है आप किसानों के द्वारा उत्पादित अनाज। जो लोग आपके अपमान करने, आपको देशद्रोही बताने में लगे हैं उन्हें बताना भी जरूरी है कि जिसे वह खाकर जिंदा है वह फैक्टरी में नहीं बनते। फैक्ट्री में बनने वाले कोई भी अतिआवश्यक चीजें राशन से अधिक आवश्यक नहीं है। उपभोक्ताओं को भी बताना जरूरी है उन्हें भी ज्ञात होनी चाहिए कि किसानों और उनके बीच के जो लोग हैं दलाली कर रहे हैं, केवल दलाली ही नहीं बल्कि बीमारियों की सौगात दे रहे हैं। आम लोगों को भी जानकारी होनी चाहिए कि उनके जीवन के लिए जाति, धर्म और सीमा की नहीं बल्कि शुद्ध हवा, पानी और केमिकल रहित अनाज की जरूरत है, जाति नहीं होगी, धर्म नही होगी और सीमा नही रहेगी तब भी वे जिंदा रह सकते हैं।

श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ 


*क्रिसमस विशेष:जो हत्यारे क्रूस में लटकाकर उनकी हत्या कर रहे थे,ईशा मशीह उनके लिए माफी मांग रहे थे-हुलेश्वर जोशी*

मेरी क्रिसमस; साथियों आज ईशा मशीह अर्थात भगवान यीशु का जन्मोत्सव है, वही ईशा मशीह जिन्होंने स्वयं सहित हम सबको को ईश्वर का संतान बताकर समाज में समानता, सद्भावना और प्रेम का रिश्ता बनाने का प्रयास किया। जीजस क्राइस्ट अपने जीवन पर्यंत बदले की भावना और दुर्भावना मुक्त जीवन जीए, उनके कार्य से असंतुष्ट होकर कथित यहूदी कट्टरपंथी (धर्मगुरु) लोग इन्हें शूली/क्रूस में लटकाकर मार डाले थे, सबसे खास बात यह है कि जब उनके हत्या के लिए उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया था तब भी वे उन क्रूर हत्यारे (धर्मगुरुओं) के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे इन्हें माफ़ कर दें क्योंकि ये अज्ञानी हैं।

भगवान ईशा मशीह के साथ हुए क्रूरतापूर्ण हत्या से समाज को सीखने की जरूरत है, हर इंसान को जानने की जरूरत है कि धार्मिक कट्टरपंथी लोग कभी भी अपने काल्पनिक मानसिकता के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। चाहे उनकी काल्पनिक मानसिकता कितने ही क्यों न अमानवीय अथवा मूर्खतापूर्ण हो, इसलिए हमें ईशा मशीह जैसे बुध्दजीवी के मार्ग में चलना चाहिए कट्टरपंथी लोगों के झांसे में आकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करना चाहिए। वास्तव में आज तक कोई भी धर्मगुरु अथवा भगवान हमें हिंसा का मार्ग नहीं दिखाता, यदि कोई हिंसा, हत्या और बदले की भावना सीखा रहा है मतलब समझने की जरूरत है कि वह सही मायने में क्या है? और क्या चाहता है?

यदि आपके धर्म, संस्कृति या आस्था प्रश्न या तर्क से भयभीत होता है मतलब ऐसे धर्म, संस्कृति और आस्था का आप स्वयं समीक्षा करें और उनसे परहेज करें..… प्रभु ईशा मशीह चाहे आपके धर्म के हों या नहीं परंतु उनके योगदान और शिक्षा उन्हें हम सबके लिए अनुकरणीय बनाते हैं।

वर्तमान में धर्म परिवर्तन और घर वापसी की जोर पकड़ी हुई है ऐसे में यह बताना आवश्यक है कि धर्म आपका संवैधानिक अधिकार है मगर प्रलोभन देकर अथवा भयभीत करके धर्म परिवर्तन कराना अपराध है। कोई भी आराध्य अथवा संस्कृति किसी एक परिवार, समाज, समूह या धर्म की कॉपीराइट नहीं है इसलिए आप चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों आप किसी भी आराध्य, ईश्वर, संत, गुरु अथवा महापुरुषों को अपना रोल मॉडल बनाकर उनके मार्ग में चल सकते हैं, उनकी आराधना, पूजा भी कर सकते हैं। कुछ बुद्धजीवियों का मानना है धर्म परिवर्तन अनावश्यक बतंगड़ है, खासकर तब जब धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक सदभावना बिगड़ रहा हो और आपके पिछले धर्म के लोग समझदार या सहनशील नहीं हैं। यदा कदा सिद्धांतों को छोड़ दें तो सभी धर्म और उसके धार्मिक सिद्धांत समान ही हैं, इसके बावजूद कुछ धार्मिक कट्टरपंथी लोग अपने धर्म के सिद्धांतों को श्रेष्ठ घोषित करने का प्रयास करते हैं जबकि सब आपस मे बराबर ही हैं।

अंत में, आप सब क्रिसमस का पर्व आनंदपूर्वक मनाएं, भगवान ईशा मशीह के जन्मोत्सव में शामिल होकर उनके आदर्शों पर चर्चा करिए।

मेरी क्रिसमस.....

(हुलेश्वर जोशी)
नारायणपुर, छत्तीसगढ़ 


*मैं इंसान नही-एच पी जोशी की कलम से*

आपके नजर में इंसान नही तो क्या हुआ; आपके शहर/गांव का भगवान तो हूँ??
धूप, बरसात और ठंड में भी मुस्तैद रहने वाला; एक अदना सा पुलिस का जवान तो हूँ??
तुम चाहे मुझे नफरत से देखते रहो, दोस्तों...
मैं फिर भी आपके सुरक्षा के लिए 24x7 तैनात तो हूँ।।1।।
आपके नजर में…... तो हूँ??

झूठे कहानी बनाकर चाहे, लाखों इल्जाम मुझपर लगाओ
भद्दे भद्दे गालियां बड़बड़ाकर, नजरें चाहे सदा चुराओ
एक घंटे मेरे ड्यूटी में आ, बड्डी बनकर तो देख साथियों....
कुछ चोर, उचक्के, गुंडे - बदमाश को कभी तुम भी तो डराओ।।2।।
आपके नजर में…... तो हूँ?? 

एचपी जोशी की कलम से


*भारत आत्मनिर्भर कब बनेगा,लेखक एच.पी.जोशी की कलम से*

आत्मनिर्भर होना हर व्यक्ति, हर समाज, हर प्रदेश और हर देश के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह संभव है अत्यंत आसान भी, केवल आपकी इच्छाशक्ति होनी चाहिए आत्मनिर्भर बनने की; अन्यथा किसी भी शर्त में आप आत्मनिर्भर नहीं हो सकते। हमें हर स्तर में आत्मनिर्भर बनने का साझा प्रयास करना होगा, इसके लिए हमें अपने आसपास के अपने क्षेत्र के व्यवसायी, अतिलघु और लघु उद्यमियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। यदि आप ऐसा नही कर रहे इसका तात्पर्य यह है कि आप आत्मनिर्भर भारत के सपने के खिलाफ काम कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है मैं अपने बच्चों के लिए जूते सैंडल खरीद रहा था। दुकान वाली लड़की किसी नए कंपनी के जूते सैंडल दिखा रही थी यह देखकर मैंने कुछ ब्रांड का नाम लिया और कहा इनमें से किसी ब्रांड का दिखाइए। मेरी पत्नी अचानक कह उठी *"आज भी ब्रांडेड खरीदेंगे? आत्मनिर्भर भारत के दुश्मन!* मैं असहज हो गया, सभी असहज हो गए, कुछ अन्य ग्राहक भी मेरी पत्नी को देखने लगे। वह समझाने में सफल रही और सभी समझने को राजी हुए। इसके बावजूद कुछ मामलों में आज भी मुझपर ब्रांडेड का भूत सवार है।

सोशल मीडिया में कई वर्षों से चीनी सामग्री की बहिष्कार करने का अभियान चलाया जाता है। केवल एक देश से निर्मित वस्तुओं का विरोध करना अत्यंत खेदजनक है, ऐसे अभियान चलाने की जरूरत ही नहीं है। हमें केवल चीन निर्मित ही नहीं बल्कि हर विदेशी, हर ब्रांडेड वस्तुओं को खरीदने से बचना चाहिए जो लघु, अतिलघु और मध्यम उद्यमियों द्वारा स्वदेश में तैयार हो रहा है। इससे न केवल स्वदेशी को बढ़ावा मिलेगा वरन आत्मनिर्भर बनने का हमारा लक्ष्य पूरा भी होगा।

आइए, हम सब मिलकर आत्मनिर्भर बनने बनाने का साझा प्रयास शुरू करें, यदि आप बेरोजगार हैं तो छोटे से छोटे काम से भी अपना रोजगार शुरू कर सकते हैं। गृहउद्योग अथवा बिल्कुल छोटे आकार के फुटपाथ अथवा आंगन में दुकान खोलने के लिए आप 500-5000 रुपये के लागत से भी अपना रोजगार शुरू कर लें, मगर आत्मनिर्भर रहें। यदि आप सक्षम या ग्राहक हैं तो ऐसे लोगों का सहयोग करिए अपनी जरूरत की सामग्री ऐसे लोगों से ही खरीदिए। देशभक्त होने का यह भी एक अच्छा तरीका है देश के लिए आप बार्डर में जाकर लड़ नहीं सकते तो भी आत्मग्लानि की कोई बात नहीं, अपने लोगों के लिए उनसे समान खरीदिए, बेरोजगार लोगों को उनका अपना रोजगार स्थापित करने के लिए आर्थिक सहयोग करिए, फोकट में नहीं तो सही उधारी में कुछ रुपये दीजिये या न्यूनतम ब्याज में रुपए दिलाइए। तभी आपका भारत आपका देश आत्मनिर्भर होगा, तभी आप और आपके आसपास के आपके अपने लोग खुशहाल जीवन जीने का आंनद उठा सकेंगे।

संक्षेप में, आपसे कुछ अनुरोध
ब्रांडेड वस्तुओं के बजाय गृहउद्योग, अतिलघु, लघु अथवा मझोले उद्यम से निर्मित अथवा फुटपाथ में बिकने वाली सामग्री खरीदिए।हर वह सामग्री जो स्वदेश में तैयार हो रहा है स्वदेशी ही खरीदिए।  आत्मनिर्भर भारत के लिए अपना योगदान दीजिए, ऐसा करना देशभक्त होने का अच्छा और आसान तरीका है।

(लेखक श्री एच.पी.जोशी नवा रायपुर छत्तीसगढ़)


*कर्म,कर्मफल और कर्म के लेखा जोखा का सिद्धांत-आलेख हलेश्वर जोशी*

कर्म, कर्मफल और कर्म के लेखा जोखा का सिद्धांत - आलेख श्री हुलेश्वर जोशी

कर्म का सिद्धांत क्या है? कर्मफल क्या है? इसे जानने के पहले हमें कर्म को जानना होगा, कि कर्म क्या है? कर्म किसे कहेंगे? कर्म अच्छे हैं या बुरे? कर्म का फल स्वयम के कर्म के अनुसार मिलता है कि हिस्सेदारी सबकी होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए आइए धरमचंद और करमचंद की कहानी पढ़ लें।

करमचंद और धरमचंद दोनो बचपन के साथी थे जन्म भी एक ही दिन हुआ था, कद काठी और देखने में लगभग एक जैसे ही लगते थे, कोई अजनबी यदि अलग अलग समय में करमचंद और धरमचंद से मिलेगा तो धोखे में रहेगा कि दोनों व्यक्ति जिससे वह मिला है एक ही है कि अलग अलग दो व्यक्ति हैं। कम उम्र में ही जब दोनों प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे तभी उनके गुरुजी ने करमचंद और धरमचंद को मितान बनवा दिया था। तब से इनकी अधिक गाढ़ी दोस्ती हो गई थी, दोनो एक दूसरे के अनन्य मित्र हो चुके थे। इनकी मित्रता कुछ कुछ सुदामा के मित्रता से मिलता था, केवल असमानता इस बात की थी कि सुदामा और गोपाल सोमरस का पान नहीं करते थे जबकि करमचंद और धरमचंद सोमरस के आदी थे। इनकी मित्रता, मित्र के लिए समर्पण और सम्मान कर्ण से अधिक था भिन्नता था तो केवल इस बात की कि कर्ण ने दुर्योधन के इच्छा को अपना धर्म मान लिया था जबकि करमचंद ने धरमचंद को ही अपना मित्र बना लिया था। वैसे दूसरा भिन्नता इस बात की थी कि कर्ण कभी सोमरस को हाथ नहीं लगाया जबकि करमचंद और सोमरस का अटूट रिस्ता था सोमरस हमेशा उनके हाथ में या लुंगी के गांठ में स्वयं को सुरक्षित मानता था।

करमचंद अपने मित्र धरमचंद के विवाह समारोह में नृत्य कर रहा था, अचानक बैंड वाले ने नागिन डांस वाला म्यूजिक बजा दिया। फिर क्या था करमचंद नागिन डान्स करने लगा, बिधुन होकर नाचते नाचते बेहोश हो गया। पता चला करमचंद के बम में पथरीले रास्ते के नुकीले पत्थर चुभ गया था, उसके बावजूद वह नाच रहा था, नीचे लुंगी खून से लथपथ हो चुका था, उसके खून से कुछ और लोग भी सना चुके थे। चस्माराम भी खून से भीग चुका था, देशी दारू की दुकान के पास किसी ने चस्माराम को बताया कि उसका कपड़ा खून से भींग चुका है। चस्माराम अपने वस्त्र के भीतर शरीर को चेक किया तब उन्हें पता चला कि उन्हें कोई चोट नही है वापस आकर चस्माराम ने बेंड रूकवाकर लोगों को बताया तब पता चला कि करमचंद को चोट लगी है, करमचंद अपने लुंगी और शरीर के खून को देखकर मूर्छित हो गया था।

अब बताओ करमचंद को क्यों चोट लगी? क्या पिछले जन्म में उसने कोई पाप किया था? क्या उसने किसी के लिए गड्ढे खोदे थे, जिसमे वह गिरा? क्या करमचंद पापी था? क्या करमचंद का नृत्य करना पाप था? क्या करमचंद और धरमचंद में पिछले किसी जन्म में कोई दुश्मनी थी? या कभी करमचंद और धरमचंद की होने वाली पत्नी के बीच कोई पिछले जन्म की दुश्मनी थी? क्या रास्ते को बनाने वाले ठेकेदार की गलती थी? क्या सरकार की गलती थी? क्या बैंड वाले की गलती थी जो उसने नागिन डांस के लिए म्यूजिक दिया? क्या धरमचंद की गलती थी कि उसने अपने विवाह में बैंड लगवाया? क्या धरमचंद के बाप का गलती था जिसने धरमचंद का विवाह तय कर दिया? क्या महुआ दारू का गलती था जिसे करमचंद ने पी रखी थी? क्या महुआ बनाने वाले भोंदुलाल का गलती था? क्या धरमचंद के छोटे भाई मतवारीलाल का गलती था जिसने महुआ दारू खरीद लाया और करमचंद को पीने दे दिया था?

फल का जिम्मेदारी कौन लेगा? किस या किसके कर्म पर आरोप लगाया जाए कि उसके कारण करमचंद अभी मूर्छित है? उत्तर बिल्कुल समझ और बुद्धि के पकड़ से दूर ही मिलता है हर अनुमान पहले सटीक जान पड़ता है फिर कुछ ही समय में उत्तर से दशकों प्रकाशवर्ष दूर चले जाते हैं यही प्रक्रिया अर्थात दूर और निकट का खेल बारम्बार नियमित रूप से पुनरावृत्ति होती है।

करमचंद और धरमचंद की कहानी पढ़ने के बाद कर्मफल का जो सटीक उत्तर मिला है उसके अनुसार प्रतीत होता है कि यहां पूरा पूरा साझेदारी का गेम है, कोई अकेला व्यक्ति अथवा उसके पूर्वजन्म के कर्म ही उनके मूर्च्छा का कारण नहीं है बल्कि प्रश्न के दायरे में आने वाले सभी व्यक्ति और उनके कर्म करमचंद के कष्ट का कारण है। संभव है किसी भी कर्म और कर्मफल का अकेला कोई व्यक्ति अथवा संबंधित व्यक्ति और उनके कर्म जिम्मेदार न हों, इसलिए करमचंद के मूर्छा के लिए सभी कुछ कुछ मात्रा में जिम्मेदार हैं।

क्या कर्म का खाता होता है? क्या कर्म का एक ही एकाउंट होता है एक जीव के लिए? क्या एक जीव के कर्म का एकाउंट सैकड़ो लाखों हो सकता है? क्या पति पत्नी का साझे का एकाउंट होता है? क्या आपके कर्म के एकाउंट से आपके निकट या दूर पीढ़ी को कुछ हिस्से मिलेंगे? क्या कर्म का एकाउंट आपके जन्म जन्मांतर तक चलता रहेगा? कर्म के एकाउंट अर्थात लेखा जोखा या खाता से संबंधित सैकड़ों प्रश्न उठते हैं; परंतु क्या इन सैकड़ों प्रश्नों का कोई अत्यंत सटीक उत्तर दे सकता है? उत्तर आता है नहीं। नहीं क्यों? क्योंकि यह अनुमान है आपका मानना है सत्य नहीं। यदि सत्यता है आपके जवाब में तो साक्ष्य भी मिलना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे आपके याहू, हॉटमेल और जीमेल एकाउंट का साक्ष्य है, आपके सोशल मीडिया एकाउंट जैसे फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, वर्डप्रेस और टिकटोक के साक्ष्य मिलते हैं। ठीक वैसे ही जैसे बैंकों के बचत खाते, जमा खाता, ऋण खाता, फिक्स डिपॉजिट, रिकरिंग डिपॉजिट, जीवन बीमा, टर्म प्लान इत्यादि का एकाउंट होता है।

कर्म का खाता तो दिखाई ही नही देता इसके साक्ष्य भी नहीं मिलते, तो क्या यह मान लिया जाए कि कर्म का एकाउंट नही होता। क्या मान लें कि कर्म का एकाउंट जैसी बात कोरी कल्पना है? इसमें थोड़ा संदेह नजर आता है क्योंकि हम हजारों वर्षों से यह मानते आ रहे हैं कि कर्म का लेखा जोखा होता है। फिर एक झटके में इन चंद प्रश्नों के झांसे में आकर अपनी बनी बनाई SOP को खारिज करके अपनी अनुशासन क्यों बदल डालें? क्यों मानने लगें कि कर्म का एकाउंट नही होता, खाता नही होता? इसे मानने के पहले भी द्वंद पैदा हो जाता है कैसा द्वंद इसे समझने के पहले हम लगभग 1,50,000 साल ईसापूर्व चलते हैं। नजूल नाथ और फजूल नाथ दो सगे भाई हैं जो रतिहारिन की संतानें हैं रतिहारिन रोमसिंग कबीला के कबीला प्रमुख की पहली पत्नी है। जब कबीला प्रमुख रोमसिंग दूसरे कबीलों को अपने कब्जे में लेने के अभियान में चल पड़े थे और लंबे बसंत तक वापस नहीं आए तो रतिहारिन को उनकी चिंता होने लगी, वे अपने रोमसिंग के तलास में निकल पड़ी। कुछ कबीला तक उनके यात्रा के दौरान उनका खूब सम्मान हुआ, आगे चलते हुए, रोमसिंग को खोजते हुए लगभग दो बसंत बीतने को आया तब वह अपने रक्षकों और अश्व के बिना नदी किनारे स्वयं को पाई, तब वह गर्भवती हो चुकी थी, उन्हें पता नहीं कि कब कैसे किसके सहयोग से वह गर्भवती हुई है। वह आसपास के काबिले में गई तो किसी ने उसे बताया कि वह कबीला प्रमुख रोमसिंग की पत्नी है, रोमसिंग को भी सूचना मिल गई वे फौरन आकर अपनी पत्नी को लेकर चल दिये। अब शोध शुरू हुई कि रतिहारिन कैसे गर्भवती हुई सबके सब जानने में असफल रहे तब एक दरबारी मंत्री ने कहा इसे प्रकृति का संतान मान लेना चाहिए अथवा शक्तिमान का आशीर्वाद मान लेना चाहिए; ठीक ऐसे ही हुआ क्योंकि दिमाक खपाने और परिणाम नहीं मिलने की संभावना को देखते हुए दरबारी मंत्री का बात मान लेना ही बेहतर विकल्प था। रतिहारिन ने दो जुड़वा संतान को जन्म दिया उनका नाम रखा गया नजूल नाथ और फजूल नाथ दोनो अत्यंत शक्तिशाली और अपने समय में विख्यात कबीला प्रमुख हुए। नजूल नाथ और फजूल नाथ के जन्म का रहस्य किसी को पता नहीं, स्वयं रतिहारिन को भी नहीं क्योंकि दीर्घकाल तक वह बेहोश रही, स्मरण शक्ति को खो चुकी थी। मगर कोई तो शक्ति है कोई क्रिया तो हुई थी जिसके कारण नजूल नाथ और फजूल नाथ का जन्म हुआ, कोई तो एकाउंट खोला होगा। प्राकृतिक अप्राकृतिक संयोग के बिना रतिहारिन का गर्भवती होना समझ से परे नहीं बल्कि स्पस्ट है। चूंकि रोमसिंग और नजूल नाथ और फजूल नाथ ही नहीं बल्कि उनके आगे के संतान भी अत्यंत शक्तिशाली हुए इसलिए किसी के पास कोई विकल्प नही था कि कोई यह कहे कि नजूल नाथ और फजूल नाथ का जन्म ठीक उनके जैसे ही सामान्य संयोग से हुआ है।

कर्म, कर्म के सिद्धांतों और उससे जुड़े इन प्रश्नों का सटीक जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है, है भी तो वह सर्वमान्य नही। अतः जब तक आप साहस और बुद्धि से काम नही लेंगे नजूल नाथ और फजूल नाथ प्रकृति की संतान है अथवा शक्तिमान के आशीर्वाद से ही रतिहारिन गर्भवती हुई है। अंत में यह साफ कर देना चाहता हूं कि यह काल्पनिक कहानी कर्म, कर्म के सिद्धांत, कर्म का खाता जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर देने असफल रहा है। इस लेख को पढ़ने में आपके समय की हुई बर्बादी को रोक सकते हैं थोड़ा सोचने से, थोड़ा अधिक सोचने से अन्यथा यह लेख आपको सुलझाने के बजाय उलझा चुका है।

आप स्वयं को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने का प्रयास करेंगे तो संभव है समुद्र तट के नन्हे कछुआ की भांति चंद्रमा की रोशनी के बजाय आप रेस्टोरेंट के एलईडी के झांसे में आ जाएं इसलिए बुद्ध की बात मानें। बुद्ध ने कहा था "अपना दीपक खुद बनो।"

 

#उल्लेखनीय है कि यह लेख श्री हुलेश्वर जोशी के ग्रंथ "अंगूठाछाप लेखक" - (अभिज्ञान लेखक के बईसुरहा दर्शन) का अंश है)#



अनिल कपूर ने किया खुलासा, 7 साल कई फ्लॉप फिल्मों के बाद इस फिल्म ने बदल दी थी जिंदगी...

 नई दिल्ली: 

62 साल के दिग्गज बॉलीवुड एक्टर अनिल कपूर (Anil Kapoor) यूं तो अपनी जिंदादिली के लिए काफी मशहूर हैं. लेकिन हाल ही में उन्होंने एक ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने अपने के स्ट्रगल के बारे में बताया है. 'राम लखन (Ram Lakhan)' और 'मिस्टर इंडिया (Mister India)' जैसी कई यादगार फिल्में देने वाले एक्टर ने हाल ही में अपने ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट किया है, जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. इस ट्वीट में अनिल कपूर ने कहा, '1977 से 1983 में काम कर रहा था और अपनी जिंदगी में एक ऐसा चांस पाने के लिए स्ट्रगल कर रहा था जो सब कुछ बदल दे और फिल्म 'वो सात दिन' वही चांस थी.' 



जब गौतम गंभीर ने वीवीएस लक्ष्मण को दी पोल खोल डालने की 'धमकी'

 अब अपनी कलाई के शानदार इस्तेमाल से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते रहे वीवीएस लक्ष्मण ने हाल ही में अपनी टीम के साथी और सलामी बल्लेबाज़ गौतम गंभीर को उनके जन्मदिन पर बधाई दी...

 


डोनाल्ड ट्रंप, पोप फ्रांसिस को छोड़ दुनिया के सभी नेताओं को पछाड़ा PM नरेंद्र मोदी ने

 ट्विटर पर फॉलोअरों की संख्या के लिहाज़ से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस को छोड़कर दुनियाभर के सभी नेताओं को पछाड़ दिया है...

नई दिल्ली: अगर हम आपसे कहें कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस को छोड़कर दुनियाभर के सभी नेताओं को पछाड़ दिया है, तो आप क्या कहेंगे... लेकिन यह सच है... दरअसल, पिछले कुछ सालों में, खासतौर पर पिछले दशक में सोशल मीडिया का प्रभुत्व खासा बढ़ा है, और वे लोग भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर हैं, जिन्होंने कभी इंटरनेट की सूरत भी नहीं देखी थी... पलभर में ही अपने विचार दुनियाभर तक पहुंचा सकने की ताकत सोशल मीडिया ने ही आपको दी, और इसी ललक में ढेरों लोग रोज़ाना इस दुनिया का हिस्सा बन रहे हैं... आम आदमी के अलावा वे लोग भी सोशल मीडिया पर अपनी हाज़िरी लगाने लगे हैं, जिनके चाहने वालों की तादाद बेहद ज़्यादा है, ताकि वे भी उन तक अपनी बात बिना किसी विलंब के पहुंचा सकें, उनसे जुड़े रह सकें...

यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कितना जानते हैं आप...? 

 


LG किरण बेदी ने पुदुच्चेरी को बताया 'पूर्व फ्रांसीसी क्षेत्र', ट्विटर पर हो गईं ट्रोल

 किरण बेदी ने ट्विटर पर लिखा, "हम पुदुच्चेरियनों (पूर्व फ्रांसीसी क्षेत्र) ने वर्ल्डकप जीत लिया है... बधाई हो, मित्रों..."

FIFA विश्वकप 2018 के दौरान पहली बार फाइनल में पहुंचने का करिश्मा करने वाली क्रोएशिया की टीम को रविवार को मॉस्को में खेले गए मैच में 4-2 से हराकर फ्रांस ने दूसरी बार वर्ल्डकप का खिताब जीता, और ऐसा कर पाने वाली वह दुनिया की छठी टीम बन गई है. इससे पहले ब्राज़ील पांच बार, जर्मनी व इटली चार-चार बार तथा अर्जेन्टीना व उरुग्वे दो-दो बार खिताब जीत चुके थे. अब इन छह टीमों के अलावा इंग्लैंड और स्पेन ही ऐसी टीमें हैं, जिन्होंने एक-एक बार वर्ल्डकप का खिताब जीता है.