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*पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता-हुलेश्वर जोशी*

पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता : श्री हुलेश्वर जोशी


"पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था ही नहीं वरन ऐसे सोच को भी समाप्त करना आवश्यक है; जब तक ऐसे अमानवीय व्यवस्थाएं समाप्त नही हो जाते आपके बहन, बेटियों के साथ अन्याय, अत्याचार, प्रताड़ना और हिंसा होते रहेंगे।" ऐसे सभी प्रकार के परंपराओं, व्यवस्थाओं और मानसिकता को समाप्त करने की जरूरत है जो मानव को मानव से जन्म, जाति, वर्ण, धर्म, सीमा और लिंग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। मेरा मानना है कि पूरे ब्रम्हांड के लगभग सारे वर्गीकरण अमानवीय और अधार्मिक हैं, जितना जल्दी हो सके वर्गीकरण के सिद्धांतों को शून्य करने की जरूरत है। हालांकि वर्गीकरण रहित सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था बनाना इतना सरल नहीं हैं, यदि ऐसा होता तो हमसे पहले जन्में लाखों बुद्धजीवी में से कुछ इसे पहले ही समाप्त कर चुके होते। बेहतर होगा कि हम ऐसे सभी वर्गीकरण को बहुत कम समय में ही समाप्त करते जाएं, क्योंकि वर्गीकरण का क्रम निरंतर चलते ही रहेगा। कोई वर्गीकरण चाहे बहुत पुराने हो या नए जब उसके हानिकारक प्रभाव अधिक होने लगे तो तत्काल ऐसे वर्गीकरण को शून्य कर देनी चाहिए। वर्गीकरण के किसी भी सिद्धांत को सिरे से खारिज कर देना अनुचित हो सकता है जैसे जाति और वर्ण के विभाजन को ही ले लें वर्तमान में यह तत्काल एक क्षण विलंब किये बिना ही समाप्त करने लायक हो चुका है जबकि संभव है यह उस समय के लिए अच्छा रहा हो, हालांकि इस आधार पर शूद्रों खासकर अछूतों के साथ हुए अन्याय, अमानवीय और अधार्मिक कृत्य किसी भी शर्त में अच्छे नहीं हो सकते।

महिला केवल हमारी पत्नी ही नहीं बल्कि माता, बहन और बेटी भी है; हर पुरुष के हिस्से में केवल एक ही महिला होगी जो उनकी पत्नी बनेगी जिसके साथ वह अत्याचार, घरेलू हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य कर सकता है। जबकि माता, बहन और बेटी के रूप में 5 महिला तक हो सकती है आपके हिस्से में केवल ये 5 महिलाएं ही नहीं बल्कि सैकड़ों महिलाएं आपके सगे संबंधियों में शामिल हैं जिनके साथ ये अमानवीय सिद्धांत अन्याय, अत्याचार और हिंसा करने के लिए पर्याप्त है। अरे मूर्ख अमानुष जब आप अपनी पत्नी के साथ अमानवीय व्यवहार, प्रताड़ना और घरेलू हिंसा करते हो, उन्हें गुलाम की तरह कैद में रखते हो तब छद्मपुरुषार्थ का अनुभव करते हो मगर जब आपके बहन खासकर बेटियों के साथ उनके पति छद्मपुरुषार्थ के लिए ऐसे कृत्य करते हैं तो आपको पीड़ा होती है क्योंकि जिसके साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा होता है उनसे आप प्रेम करते हैं। "यदि कोई पागल अपनी पत्नी को अपना प्रॉपर्टी, सेविका, दासी या गुलाम समझता हो तो उन्हें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि उनके ही सिद्धांत के आधार पर उनकी अपनी बहन और बेटी को भी कोई दूसरा वैसे ही समझेगा जैसा वह अपनी पत्नी या बहु को समझता है।"

मेरे एक बहुत अच्छे मित्र हैं वे अपनी प्रेमिकाओं को गिनते थे तो उन्हें बड़ा आनंद आता था, तब हम सब नाबालिग हुआ करते थे। जिन्हें वे अपनी प्रेमिका बताते थे उनमें से अपने 8वी पास होने तक एक हाथ की उंगली के बराबर लड़कियों से फिजिकल रिलेशन बना चुके थे, उनका लक्ष्य था बालिग होने तक दोनों हाथ पैर के उंगलियों और अंगूठे को गिनती में शामिल करना। इसी बीच उनकी चचेरी बहन बड़ी होने लगी थी, एक समय आया कि एक नाबालिग मित्र उनके नाबालिग बहन से फिजिकल रिलेशन के लिए प्रयास करने लगा यह बात इन्हें भी पता चला तो ये बौखला गए। मैं अपने साथियों में सबसे बड़े उम्र का था सो समझाने बुझाने का जिम्मेदारी मेरा था, जब मीटिंग हुआ तो उस नाबालिग मित्र ने मेरे मित्र से कहा कि आप अधिकतर लड़कियों से फिजिकल रिलेशन का लक्ष्य बनाए हुए हैं मतलब वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से आप सबको अपवित्र कर चुके हैं तो मैं किसे अपनी प्रेमिका मानूं, मेरे नजर में तो केवल हम दोस्तों की ही बहन ही बची हैं जो पवित्र हैं, जिसे एक पल के लिए भी कोई अपना प्रेमिका नहीं समझा है इसलिए मैं तो आपके बहन को ही अपनी प्रेमिका मानूंगा, आपके बहन का नाम हर दोस्तों को बताऊंगा कि वह मेरी प्रेमिका है, अपने कॉपी पुस्तक में आपके बहन का ही नाम लिखूंगा, कहीं अकेले दिखने से पीछा करूँगा, आभा मारके सायरी सुनाऊंगा, अंततः आपके बहन से ही फिजिकल रिलेशन का प्रयास करूंगा। आप मुझे रोकने का प्रयास करोगे तो ठीक नहीं होगा आपके टारगेट के सारे लड़कियों के बाप और भैया को बता दूंगा, आपके घर से लेकर डिंडोरी स्कूल तक उन लड़कियों के साथ आपके नाम को दीवालों और सड़क में लिख दूंगा। ये विवाद कई घंटों के बाद समाप्त हुआ और तय हुआ कि मेरे मित्र आज के बाद किसी भी लड़की को फ्लर्ट नहीं करेगा और दूसरा मित्र भी इनके बहन को सगी बहन के बराबर सम्मान देगा। ये उन लड़कों की कहानी है जो पिछले 2साल पहले राहेन नदी में निर्वस्त्र होकर नहाया करते थे, सार्वजनिक तालाब में भी बिना गमछा या टॉवल के चड्डी बदलते थे, ये सारे बच्चे तब एक गोलाई में बैठकर नदी किनारे टॉयलेट करते थे। इस उम्र में ही जब हमें स्त्री भोग की वस्तु लगने लगी थी तो भला बताओ हम स्त्री का सम्मान कैसे कर पाएंगे। हमारी सामाजिक मानसिकता भी बड़े गजब की है, इतनी दूषित इतनी गंदी कि मुझे लिखने में और आपको पढ़ने में लज्जा आ जाये, मगर जिस हद तक मैं लिख सकता हूँ उस आंटी की भी बेशर्मी लिखूंगा। ये मानसिकता केवल उस आंटी की नहीं जिसके बारे में लिख रहा हूँ, समाज की कुछ अधिकतर महिलाओं की भी है, कुछ महिलाओं को कई बार इन मानसिकता के साथ वार्तालाप में मशगुल देखा हूँ। मैं तब 12वीं का स्टूडेंट था लगभग 20साल का हो चुका था फिर भी स्वभाव से अपने शक्ल जैसे ही स्वीट था जिसके कारण अधिकतर लोग मुझे युवा नहीं जान पाते थे। मैं किराए के मकान में रहता था जहां बड़े भैया कंप्यूटर सेंटर के शाखा प्रबंधक और शिक्षक हुआ करते थे। कभी कभी मैं भी शिक्षक का काम करता कंप्यूटर सिखाता था हालांकि वहीं मेरा स्कूल था जहां मैं पढ़ता था। अक्सर शाम को मैं छत में ही टहला करता था, एक लड़की मुझे भी पसंद थी जिसका छत मेरे छत से कुछ दूर था जब वह अपने छत में होती तो कपड़े के पहनावा और छत में टहलने की गति से उसे पहचान सकता था। चूंकि मैं माता श्यामा देवी का शिष्य हूँ इसलिए मेरे मन में किसी भी लड़की, युवती या महिला के लिए अश्लील विचार कम आते थे, मैं प्रेम में फिजिकल रिलेशन का कट्टर विरोधी था जिसके कारण मेरे दोस्त जोगीबाबा तो कहते ही थे, पीठ पीछे मेरे पुरुषार्थ को लेकर मेरा उपहास भी करते थे। उस दिन मैं शाम को छत में ही था उस मकान के लगभग सारे किरायेदार शाम को छत के अलग अलग कोने में बने चिमनी के ऊपर और आसपास बैठकर मन हल्का करते थे, तब डिंडोरी में केवल एक एसटीडी पीसीओ था जो सायद कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आईएसडी की सुविधा भी मुहैया कराता था और दो दुकान में डब्ल्यूएलएल फोन था जहाँ से केवल राज्य के टेलीफोन और मोबाइल में बात हो सकती थी, मकान मालिक के घर एक ब्लेक एंड व्हाइट टीवी था और हम 6-7 किरायेदार में एक और टीवी था सायद रंगीन था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मनोरंजन का साधन नहीं था इसलिए आपस मे मिलजुल कर रहना ही रहना विकल्प था; हालांकि कुछ महिलाएं जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसे नीच मानसिकता से ग्रसित भी थीं जो अपने बच्चे को दूसरे बच्चों से खेलने से मना करती थी खासकर मोहल्ले के बच्चों से। छत बहुत बड़ा था, सायद उस कस्बे की सबसे बड़ा छत था फिर भी कुछ कोनो से दूसरे कोने की बात सुनी जा सकती थी।आज कुछ आंटियां छत में बैठकर किसी लड़की के चारित्रिक गुण अवगुण पर चर्चा करते हुए लड़की के माता-पिता के परवरिश पर उंगली उठा रहे थे। उस औरत के 2 या 3 लड़के थे, ठीक से याद नहीं आ रहा है। वह औरत बहुत ठेठ हिंदी छत्तीसगढ़ी में अपना पक्ष रखते हुए बोल रही थी "लड़के तो भौरा जात होते हैं, मेरे लड़का का क्या दोष? लड़की (नाम लेकर) के माता पिता को अपनी बेटी सम्हालकर रखना चाहिए, उन्हें होश होना चाहिए कि उनकी बेटी जवान हो रही है, घर में सम्हाल के रखना चाहिए, कहाँ कहाँ आती जाती है, किसके साथ जाती है? क्या कर रही है? किसके साथ क्या गुल खिला रही है? जो माता पिता अपनी बेटी को सम्हाल नहीं सकते वे पैदा ही क्यों करते हैं बेटियों को?" इतना सब कुछ सुनकर मेरे मन में आया बड़ा सा पत्थर उठाकर अपने भीतर के रावण को जिंदा कर दूं मगर वहां कोई पत्थर नहीं था हालांकि ईंट से काम चला सकता था। मेरे क्रोध का कारण था कि मेरी बहनें हैं और मैं उन्हें अपने भांति ही बराबर का आजादी देने का पक्षधर हूँ। मैं जब अपने बचपन में रात में गम्मत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, टीव्ही, वीसीआर देखने की बात करता था तो मेरे बड़े भैया श्री देव जोशी एक ही बात बोतले थे जहां आप मोनू (मेरी बहन है) के साथ जा सकते हो वहां जरूर जाओ और जहां उन्हें नही ले जा सकते मतलब समझो कि वहां जाने योग्य नहीं है। मोनू को भी साथ ले जाओ और चले जाओ तुम्हें फूहड़ सांस्कृतिक कार्यक्रम या वीसीआर देखने जाना है। मैं इस प्रकार के शर्त इतने बार सुन चुका था कि बड़े भैया का संदेश मुझे समझ में आ चुका था और दूसरी सबसे प्रमुख बात लड़कों और पुरुषों के मानसिकता को भली भांति जानता था।

हम हजारों साल पहले के कुछ साहित्य पढ़ें तो पता चलता है कि पुरुष प्रधान समाज होने के कारण पुरुष हमेशा से महिलाओं को भोग विलास की वस्तु मानने की मानसिकता के साथ जन्म लेता है, पत्नी और संतान जिसमे बेटियां भी शामिल है को अपना संपत्ति मानता है जबकि महिलाओं के लिए ऐसे अवधारणा बनाई गई है जिसमें पति को परमेश्वर, भगवान या देवता मानकर उनके हर इच्छा के लिए समर्पित रहने और उनके सेवा करने को उनका धर्म बना दिया गया है। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की दुर्दशा ऐसी रही कि स्त्री को अपने पति का नाम लेने का भी अधिकार नही था और ऐसे अमानवीय परंपराओं में हम गौरव करने का हुंकार भरते हैं। स्त्री को संपत्ति मानकर जुआ में खेल जाना, पुत्र को बेच देना या पुत्री को दान कर देना कहाँ तक उचित था? हम जिसे गौरवशाली परंपरा मानते हैं उसमें पत्नी को वस्तु की भांति मानी जाती थी। फिर हम स्त्री के साथ, नारी के साथ या महिला के साथ मित्रता कैसे कर सकते हैं? उनके समान अधिकार को बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं? मगर धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर आखिर कब तक महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाए?

अब वह दिन बहुत जल्दी ही आएगा जिसमें हम सब मिलकर पुरुष प्रधान सामाजिक मानसिकता को समाप्त कर देंगे; यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि हम आज भी जानवर की भांति ही हैं। पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को हिलाने के लिए बुद्धजीवियों के साथ स्त्री को भी आगे आना होगा, लड़ना होगा। पुरुषों से पहले अपनी खुद की दुषित हो चुकी मानसिकता से उन्हें मुक्त होना होगा अन्यथा उन्हें अधिक दिनों तक यथास्थिति सहते रहना पड़ेगा। स्त्री को, महिला को, नारी को या लड़कियों को माँ, बहन, बेटी, पत्नी या बहु होकर नहीं बल्कि मनुष्य होकर जीवन जीना होगा अपने हक के लिए उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़ना होगा ठीक ख़ुशी की तरह। खुशी आज अपने ससुराल में पूरा परिवार चला रही है, सही अर्थों में परिवार की मुखिया है क्योंकि परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य है। खुशी मानसिक रूप से मुझसे भी अधिक आज़ाद है हालांकि पुरुष प्रधान सामाजिक मानसिकता वाले समाज में उन्हें हजारों चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

ख़ुशी (परिवर्तित नाम) पड़ोस की बुआ और उनके पति के रिश्ते को देखकर पति जैसे रिश्ते को दरिंदा समझ बैठी है। उनके नजर में अधिकांश पुरुष महिला को जिसे वह पत्नी मानते हैं शराब पीकर पीटते हैं, गुलाम की तरह घर के चारदीवारी में कैद रहने को मजबूर करते हैं। इसलिए वह 6-7 साल की नन्ही सी बच्ची निश्चय कर चुकी है कि वह कभी विवाह ही नही करेगी। आगे जब लगभग 10साल और बड़ी होकर कक्षा 12वी की स्टूडेंट रहती है तब थोड़ा उदार होकर विवाह की संभावना को स्वीकारते हुए सोचती है कि वह स्वयं पहले आर्थिक रूप से सक्षम होगी उसके बाद विवाह करेगी। ठीक इसी साल वह झमलु के प्रेम का शिकार हो जाती है, भीतर ही भीतर वह झमलु को अपना सर्वस्व स्वीकार लेती है मगर कुछ ही दिनों में वह खुद को पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से जकड़ी हुई गुलाम पाती है। माँ लोकलाज की दुहाई देकर उनके जीवन को निष्प्राण कर जाती है, अब हर क्षण उनके शरीर के भीतर आत्मा और मानसिकता की लड़ाई होती रहती है अब उसका शरीर शरीर नहीं बल्कि कुरूक्षेत्र का मैदान हो चुका है। कुछ समय तक जिन्हें अपना पति के रूप में पाने को संकल्पित थी, जिसे स्वप्न देखा करती थी खुद को उससे दूर करने का अथक प्रयास करती रहती है, कल्पना जो खुशी की ममेरी बहन है झमलु को भैया मानती है इस नाते खुशी को भाभी कहती है और खुशी उन्हें ननद। सुमन जो खुशी और झमलु की सहपाठी है उनका मानना था कि ये आदर्श प्रेम श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम से अधिक गहरा भले न हो मगर उससे अधिक आदर्श और पवित्र जरूर है। जब खुशी की टोली बैठती थी तो एक ही विषय हुआ करता वह है झमलु और खुशी के प्रेम; झमलु के प्रेम में होते हुए भी खुशी अपने टोली के सामने जाहिर करने की साहस नही कर पाती क्योंकि वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित खुद को मर्यादाओं की गुलाम बना चुकी है। मानसिकता के गुलामी के कारण खुशी को अक्सर सुमन और कल्पना सहित अन्य सखियों से खरी खोटी सुननी पड़ती थी, खुशी ऐसे स्थिति में थी कि वह न तो अपना प्रेम जाहिर कर पा रही थी और न तो नकार सकती थी कि उन्हें झमलु से प्रेम नही है। अब झमलु कस्बा छोड़कर परदेश जा चुका था, खुशी और झमलु एक दूसरे से दूर होने के बाद आपस में बात किये बिना भरपेट भोजन नहीं कर पाते थे क्योंकि जब तक झमलु उसके कस्बे में था रोज पोस्ट ऑफिस के बहाने उसके घर के सामने से गुजर ही जाता जिसे वह छत, खिड़की या दरवाजा के सामने से देख लेती थी। बहुत दिनों में खुशी को झमलु का मोबाइल नंबर मिला था तो वह उसे दोस्त के रूप में नए रिश्ते बरकरार रखने को आग्रह कर रोज कमसेकम एक बार बात करने के लिए राजी कर चुकी है। इस बीच खुशी विवाह योग्य हो चुकी थी, वह अपने कस्बे के ही स्कूल में पढ़ाती थी उनसे विवाह के लिए कई रिश्ते आते मगर वह मूर्ति बनकर सामने उपस्थित हो जाती थी। कुछ दुसरे या तीसरे क्रम में दुर्ग से उनके लिए रिश्ता आया वे शादी के लिए तैयार हो गए थे बारम्बार उनके घर जाते और सामाजिक दबाव के साथ विवाह के लिए आग्रह करते। यह पहली बार था जब खुशी अपना मुंह खोली और स्पष्ट शब्दों में बोल दी थी कि उनके कुछ शर्त हैं यदि शर्त स्वीकारेंगे तो ही मैं विवाह करूंगी, अन्यथा नहीं। शर्त की बात सुनकर खुशी और लड़के के परिवार और रिश्तेदार सहित लड़का भी चुप हो गया, लड़के के पिताजी पसीने से तरबतर हो गए फिर भी खुद को सम्हालते हुए बोले बताओ बेटा आपकी हर शर्त मंजूर है। खुशी फिर से बोलती है सोच लीजिये पिताजी मेरा जो शर्त है वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के ख़िलाफ है जिसे सुनकर लोगों की रूह कांप जाती है। लड़के के पिता जी बोले बताओ बेटा हमें आपकी शर्त मंजूर है, हम ऐसे किसी मानसिकता से ग्रसित नही हैं जो महिला और पुरुष में भेद करता हो। अंततः खुशी बोलने लगी :
1- मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हूँ और आगे भी आत्मनिर्भर बने रहूंगी।
2- मैं किसी भी शर्त में पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के अनुरूप गुलामी की जिंदगी नहीं जियूंगी।
3- मैं अकेले ही घरेलू काम नही करूंगी, मेरे होने वाले पति को भी मेरे साथ खाना बनाना होगा, बर्तन धोना होगा, झाड़ू पोछा करना होगा और कपड़े धोने जैसे सारे काम करने होंगे।
4- मैं पति परमेश्वर है, ईश्वर है, भगवान है, स्वामी है या देवता है जैसे फरेबी मानसिकता को नहीं मानती, मैं अपने पति का दोस्त होना चाहती हूँ।
5- मुझे बहु जैसे नहीं रहना है बल्कि बेटा जैसे सारे आजादी चाहिए।
6- किसी भी शर्त में मैं प्रताड़ना का शिकार नही होना चाहती, यदि मुझे मेरे पति शराब पीकर या बिना पीए मारपीट करेंगे तो उसे सहूंगी नहीं बल्कि मैं भी डंडे और लात घुसे से मारूँगी। यदि मेरे पति शराब पीकर घर या घर के बाहर हुड़दंग मचाएंगे तो मैं भी उनका साथ दूंगी, साथ में शराब पियूंगी और हुड़दंग मचाऊंगी।
7- मैं घूंघट, पर्दा और श्रृंगार अपने इच्छा के अनुसार करूंगी अर्थात ससुराल में बेटी की तरह ही रहूंगी।
8- मैं शादी होकर जाऊंगी मगर अपने माता पिता को त्यागूँगी नहीं, बल्कि कमसेकम 50% समय अपने पति सहित आकर अपने मायके में भी रहूंगी क्योंकि विवाह के बाद अपने पिताजी से संपत्ति में बटवारा लुंगी।
9- यदि मेरे शर्त स्वीकार हो तो मैं शादी करने तैयार हूं, मैं आपको वचन देती हूं कि अपने ससुराल के आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में और परिवार के लोगों का सम्मान करने में कोई कमी नही करूंगी।
10- मैं यह भी वचन देती हूं कि मैं विवाह के बाद जीवन पर्यंत साझे परिवार में रहने का प्रयास करूंगी और अपने सास ससुर की अपने माता पिता के बराबर ही सेवा और सम्मान करूंगी।

दांतों तले उंगली दबाए सब कुछ सुनते रहने के बाद लड़के के दादाजी एक पाँव में खड़े हुए और हाथ जोड़कर बोले "धन्य हैं आपके माता पिता जिन्होंने आपको जन्म और ऐसे संस्कार दिए, मैं भी चाहूंगा कि मेरी बेटी ऐसे सोच रखे मगर बेटा खुशी हम माफी चाहते हैं।" केवल इतना ही बोलकर घर से निकल गए, उसके साथ साथ उनके सारे रिस्तेदार चुपचाप निकल गए, किसी ने किसी से कुछ नही कहा। खुशी के माता पिता भी खुशी के शर्त और शब्दों की तैयारी सुनकर चौंक गए थे चूंकि खुशी के पापा शिक्षक हैं, बहुत सज्जन पुरुष हैं और सबसे खास बात यह कि वे खुशी के पापा हैं सो वे बोले बेटा मुझे गर्व है कि "मैं आपके पापा हूँ मैं आपके शर्त से सहमत हूँ क्योंकि मैं जानता हूं कि पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता महिलाओं के लिए समानांतर बिलकुल नहीं है। अधिकतर पुरुष हर शर्त में स्वयं को सर्वोच्च मानते हैं और महिलाओं के हक, अधिकार और आजादी के खिलाफ ही रहते हैं।" तीसरे दिन खुशी अपने टोली के साथ छत में बैठी हुई है कल्पना रट्टा मारके खुशी के शर्त को सुना रही है आज उनके ठहाके पड़ोसी को भी सुनाई दे रही है। सुमन कहती है "आपके शर्त इस शर्त में ही पूरे हो सकते हैं कि आपके पति के परिवार आर्थिक रूप से थोड़ा कमजोर हों, मानसिक दिवालियेपन से ग्रसित न हों और सबसे खास बात आपके पति का उम्र आपसे कम हो।" अन्यथा आपको भविष्य में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कल्पना कहती है "दी, यदि अभी कोई आपके हाँ में हाँ मिलाकर आपसे विवाह कर ले फिर सुहागरात मनाने के बाद या एकात संतान पैदा करने के बाद आपको धोखा दे दे तो क्या करोगी? खुशी कहती है आर्थिकरूप से सक्षम रहूंगी मतलब तलाक दे सकूंगी। इतना सब कुछ सुनने के बाद सुमन खुशी को सुझाव देती है :
1- अपने स्वयं से कम उम्र के लड़के से शादी करना, ताकि उसकी हिम्मत न हो आपसे गाली गलौज करने और मारपीट करने की।
2- आपके जैसे सोच वाली लड़कियों को स्वयं कमाऊ होना चाहिए जबकि जीवनसाथी के रूप में आर्थिक रूप से कमजोर अर्थात पत्नी के ऊपर आश्रित रहने योग्य लड़के से शादी करनी चाहिए।
3- अपने से कम अकादमिक योग्यता और कम स्किल वाले लड़के से शादी करना, ताकि आपके सामने ज्यादा होशियारी न मारे।
4- यदि विवाह के बाद भी पता चले कि आपके पति शराबी, जुआरी अथवा सट्टेबाज हो तो तत्काल उसे तलाक दे देना।
5- पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित लोग आकश्मिक स्थिति में अपनी पत्नी को त्यागकर अनेक विवाह कर लेने के लिए तैयार रहते हैं वैसे ही लड़कियों को भी अपना सोच विकसित रखने की जरूरत है; किसी भी प्रकार से शारिरिक मानसिक प्रताड़ना को बर्दाश्त किये बिना कानून/न्यायालय का शरण लेने अथवा तलाक देने के लिए तैयार रहना होगा।
6- किसी भी शर्त में आत्महत्या करना व्यर्थ और अमानवीय है।
7- हम लड़कियों को दहेज प्रताड़ना अथवा घरेलू हिंसा के झूठे मामले में फसाने वाली मानसिकता से बचकर रहना चाहिए।

महिलाओं के मानवाधिकार और उनके लिए पुरुषों के बराबर समान आचार संहिता लागू करने के लिए आवश्यक है कि आप अपनी बेटियों को ऐसे शिक्षा दें कि वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता का नाश करने में अपना योगदान दे सके। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आपकी बेटी गुलामी और गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो, दामाद शराब पीकर आपके बेटी की पिटाई करे अंतत आपकी बेटी आत्महत्या कर ले। यदि आपको खून की आँसू नही रोना है तो मेरे साथ आओ आज ही पुरूष प्रधान समाज की गंदी मानसिकता का नाश करने के लिए काम शुरू करें। यदि आप चाहते हैं कि आपकी बेटी का बलात्कार न हो, आपकी बेटी प्रताड़ना, हिंसा अथवा हत्या से सुरक्षित रहे तो बेटियों की आजादी और उनके कपड़े पर रोक लगाने से अधिक आवश्यक है कि आप अपने बेटा को लड़कियों/ महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाइए, उनके नजरिया को बदलिए। आज हमारे समाज को बलात्कारी बनाने में बड़े पर्दे और छोटे पर्दे के सिनेमा और सोशल मीडिया का सबसे अहम योगदान है क्योंकि यहीं से अश्लीलता परोसी जा रही है इसके पहले हमारा समाज भले ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और आजादी नही दे पाए मगर महिलाओं के लिए इतनी गंदी सोच नहीं था। आज टेलीविजन और सिनेमा महिलाओं को सशक्त करने में अवश्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा हो मगर लड़कियों/महिलाओं के कपड़े छोटे करने और लड़कों/पुरुषों के मानसिकता को गंदे करने में सबसे आगे है। जितना जल्दी आप और आपके पुत्र सहित पुरुष वर्ग लड़कियों/महिलाओं को भोग की वस्तु समझने के बजाय बेटी, बहन या मित्र स्वीकार लेंगे नाबालिग लड़कियों और महिलाओं जिसमें आपकी बहन और बेटियां शामिल हैं के साथ बलात्कार और क्रूरता पूर्ण हिंसा भी समाप्त हो जाएंगे। पुरुषों को अपनी गंदी मानसिकता को छोड़ना होगा, मैं अपने आसपास के अधिकतर लोगों को जानता हूँ जो आज तक भले ही किसी बलात्कार के प्रकरण में शामिल नहीं हुए हैं अर्थात बलात्कार के आरोपी नही हैं या बलात्कार नही किये हैं मगर उनकी नजरें और मानसिकता इतने गंदे हैं कि पवित्र और सार्वजनिक स्थान में खड़ी, बैठी या झुकी हुई लड़कियों और महिलाओं का भी .. .. .. कर जाते हैं। जिन लोगों को मैं जानता हूँ उनमें से अधिकतर लोग अपने संतान से भी कम उम्र के लड़कियों/महिलाओं के शारीरिक बनावट को घूरते रहते हैं ऐसे नीच लोग अंदर ही अंदर नहीं बल्कि साथियों को बोलकर भी फिजिकल रिलेशन की इच्छा जाहिर कर जाते हैं और शारीरिक बनावट को आकर्षण का केंद्र बना लेते हैं यही कारण है कि आज पुरुषों की मानसिकता अधिक गंदे होते जा रहे हैं, छोटे छोटे लड़के भी बलात्कार के आरोपी हो रहे हैं। अभी तक हुए और होने वाले सभी बलात्कार और क्रूरता के लिए मैं और आप दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं; अपनी बहन बेटियों के साथ होने वाले प्रताड़ना, हिंसा और क्रूरता के लिए भी हम सब बराबर के जिम्मेदार हैं। नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य के बाद मोमबत्ती जलाने या सरकार को कोसने के बजाय अपने संस्कार को बदलिए अपने विचार बदलिए बेहतर होगा कि अश्लीलता फैलाने वाले सारे फिल्मों और धारावाहिक में रोक लगाने में लग जाओ।
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उल्लेखनीय है कि यह लेख श्री हुलेश्वर जोशी के आत्मकथा "अंगूठाछाप लेखक" (अबोध लेखक के बईसुरहा दर्शन) का एक अंश है। 


*Heart attack के कारण और बचाव के उपाय-हुलेश्वर जोशी*

(स्वास्थ्य जागरूकता पर आधारित लेख)

यदि आप नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं या जंकफूड खाते हैं; कठोर परिश्रम या योगा अथवा व्यायाम नहीं करते और स्मार्टफोन अथवा लेपटॉप / कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करते हैं तो सावधान 50% से अधिक गारंटी है कि आपको Heart Attack होगा।

महिलाओं में हार्ट अटैक से बचने के लिए पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता होती है, मगर यदि कोई महिला नशीले पदार्थों का सेवन, जंकफूड का सेवन और स्मार्टफोन अथवा लेपटॉप/कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करती हो तो मोनोपॉज के 5-10 साल के बाद पुरुषों के बराबर ही संभावना होगी कि उन्हें भी Heart Attack आ जाए। इसलिए महिलाओं को नशीले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।

खराब और असंयमित दिनचर्या के कारण अब 30 साल से कम उम्र के युवाओं में भी Heart Attack की संभावना दिनोंदिन बढ़ती जा रही है; इसलिए सीने में अधिक दर्द होने की स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय सहायता लें।

Heart Attack से बचाव कैसे संभव है?
# कभी भी किसी भी शर्त में नशीले पदार्थों का सेवन न करें।
# जंकफूड अर्थात अधिक तेल में तले भोज्यपदार्थों का सेवन न करें। भोजन में सलाद और कम पके सब्जियों को शामिल करें। अधिक मसालेदार भोजन आपके सेहत के लिए हानिकारक ही होगा। अपने भोजन में न्यूनतम मात्रा में ही नमक को शामिल करें।
# स्मार्टफोन, गैजेट्स, लेपटॉप अथवा कंप्यूटर सिस्टम का न्यूनतम इस्तेमाल करें।
# नितमित रूप से कठोर शारीरिक परिश्रम करें; अर्थात अपने सारे काम खुद करें। यदि संभव न हो तो योगा अथवा व्यायाम करें।
# भरपूर नींद लें और तनावमुक्त रहें।
# मोटापा से बचें।
# बेवजह औषधियों के प्रयोग से बचें।

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आवश्यक सूचना : उपरोक्त जानकारी लेखक के जानकारी के आधार पर लिखे गए हैं, यह किसी भी प्रकार से दावा अथवा गारंटी नहीं है। 

(लेखक श्री हुलेश्वर जोशी)


*कोई हसीन ख्वाब लेकर आ मेरे दिल मे*

मेरे दिल में.....

कोई हसीन ख्वाब लेकर आ मेरे दिल में
बिना बुलाए बस जा, मेरे दिल में
मैं करीब ही तो हूं कहीं तेरे दिल में.....
एक हसीन ख्वाब लेकर बस जा मेरे दिल में

मुझे किसी मंजिल की जरूरत नहीं
तेरे जाने के बाद, मेरे दिल में
एक भोली सुरत बनकर आ जाओ.....
एक हसीन ख्वाब लेकर बस जा मेरे दिल में

कोई आंखों से पुकारती है समां कर मेरे दिल में
कोई छिपकर चोरी से देखती है मेरे दिल में
प्लीज तुम भी आ जाओ न .....
एक हसीन ख्वाब लेकर बस जा मेरे दिल में

(हुलेश्वर जोशी, कंगोली-जगदलपुर)
सोमवार, अप्रेल 18/2011 की रचना 


वाराणसी जाएं तो जरूर घूमें ये जगहें, यादगार रहेगी यात्रा

 वाराणसी जाएं तो इन जगहों पर जाना ना भूलें, इनके बिना आपकी यात्रा का मजा अधूरा ही रह जाएगा.

अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं तो आपकी लिस्ट में वाराणसी जरूर होगा. देश की सबसे प्राचीन नगरी के रूप में विख्यात वाराणसी में पर्यटकों को बिल्कुल अनोखा अनुभव मिलता है. बनारस की संकरी गलियों में घूमना हो या फिर घाट किनारे का नजारा, ये सब यादगार पल बन जाते हैं. अगर आप वाराणसी जाएं तो इन जगहों को जरूर शामिल करें.

मंदिर-

वाराणसी काशी के नाम से भी विख्यात है. यहां के हर सड़क और गली में आपको एक मंदिर जरूर मिल जाएगा. हालांकि, गंगा के घाट किनारे कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनका ऐतिहासिक और बनावट के लिहाज से खास महत्व रहा है. यहां आकर हर कोई सबसे पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने जरूर पहुंचता है. यह मंदिर शिव को समर्पित हैं. इस मंदिर की छत पर सोना मढ़ा हुआ है. दुर्गा मंदिर और संकट मोचन मंदिर भी जरूर जाएं.

घाट-

वाराणसी को अगर घाटों का शहर कहें तो कुछ गलत नहीं होगा. यहां कुल 84 घाट हैं. श्रद्धालु यहां गंगा के पवित्र जलों में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं. इन घाटों पर बैठने के बाद आप अलग ही दुनिया में चले जाते हैं. मन की सारी उथल-पुथल यहां आने के बाद शांत हो जाती है. सुबह-सुबह बोटराइडिंग का भी मजा ले सकते हैं. दशाश्वमेध घाट की आरती का अनुभव भी खाय होता है. इसके अलावा अस्सी घाट और मणिकर्णिका घाट भी मशहूर हैं.


हिमाचल में बर्फबारी देखने का एक और मौका

 अगर बर्फबारी देखने का मन है और अभी तक आप हिमाचल प्रदेश नहीं जा पाए हैं तो आपके पास एक और मौका है.

अगर आप पिछले सप्ताह हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में बर्फबारी का मजा उठाने से चूक गए, तो एक और मौका है. शिमला मौसम विभाग ने बुधवार को 11 से 12 जनवरी के बीच और अधिक बर्फबारी का पूर्वानुमान जताया है. मौसम विभाग के निदेशक मनमोहन सिंह ने बताया, "शिमला, नारकंडा, कुफरी, कल्पा, डलहौजी और मनाली जैसे अधिकांश प्रमुख पर्यटन शहरों में हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है."

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में 10 जनवरी की शाम से पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने की संभावना है और यह 13 जनवरी तक सक्रिय रहेगा.

उन्होंने कहा, "राज्य में पश्चिमी विक्षोभ का ज्यादा असर 12 जनवरी को देखा जाएगा जिसके प्रभाव से शिमला, किन्नौर, सिरमौर, कुल्लू, चंबा और लाहौल-स्पीति जिलों में भारी बर्फबारी की संभावना है."

राज्य के निचले इलाकों जैसे धर्मशाला, पालमपुर, सोलन, नाहन, बिलासपुर, ऊना, हमीरपुर और मंडी में व्यापक बारिश की संभावना है, जिससे तापमान में गिरावट आएगी.

शिमला, नारकंडा, कुफरी, कल्पा, डलहौजी और मनाली जैसे अधिकांश प्रमुख पर्यटन शहरों में 6 जनवरी को हल्की बर्फबारी हुई थी.

शिमला का बुधवार को न्यूनतम तापमान 3.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि कल्पा में शून्य से सात डिग्री कम, मनाली में शून्य से चार डिग्री नीचे, डलहौजी में 2.9 डिग्री, कुफरी में 0.7 डिग्री और धर्मशाला में 2.2 डिग्री दर्ज किया गया.

कल्पा में मंगलवार से 3.8 सेंटीमीटर बर्फबारी दर्ज की जा चुकी है.

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कहा कि बर्फबारी से निपटने के लिए वह पूरी तरह से तैयार है.

निवासियों और पर्यटकों को सलाह दी गई है कि वे ऊंची पहाड़ियों पर न जाएं क्योंकि सड़क मार्ग अवरुद्ध होने की काफी संभावना है.

एक सरकारी अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि राज्य के दूरदराज के इलाकों में लोगों को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और परिवहन में बाधा आ सकती है.

शिमला के पास के इलाके जैसे कुफरी और नारकंडा और लोकप्रिय पर्यटक रिसॉर्ट मनाली और डलहौजी के अभी भी बर्फ की मोटी चादर में लिपटे हैं.

शिमला के उपायुक्त अमित कश्यप ने पर्यटकों से अपील की है कि वह शिमला से आगे कुफरी की ओर अपने वाहनों से यात्रा करने से बचें क्योंकि पिछले सप्ताह हुई बर्फबारी के बाद सड़कें फिसलन भरी हैं.


हिमाचल में इस सप्ताह होगी बर्फबारी, जाएं घूमने

 हिमाचल घूमने गए पर्यटक बर्फबारी का आनंद लेने की उम्मीद के साथ अपनी छुट्टियां बढ़ा रहे हैं. मौसम विभाग ने इस सप्ताह लगातार बर्फबारी होने की संभावना जताई है.

 


आठ साल में पहली बार घट गई अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या

 भारतीयों के लिए अमेरिका एक पसंदीदा देश रहा है. हर साल लाखों की संख्या में भारतीय अमेरिका का रुख करते हैं. लेकिन साल 2017 में अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या घटी है.

पिछले आठ साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले भारतीयों की संख्या घटी है. अमेरिका के वाणिज्य विभाग की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है.

रिपोर्ट के अनुसार साल 2017 में अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या 11.4 लाख थी, जो इसके पिछले साल से 5 फीसदी कम है. साल 2016 में करीब 11.72 लाख भारतीय अमेरिका गए थे.

अमेरिका के वाणिज्य विभाग के नेशनल ट्रैवल ऐंड ट्रेड ऑफिस (NTTO) द्वारा हर देश से अमेरिका आने वाले लोगों के आंकड़े जारी किए जाते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक साल 2009 में कुल 5.5 लाख भारतीय अमेरिका की यात्रा पर गए थे. तब इसमें इसके पिछले साल के मुकाबले 8 फीसदी की गिरावट आई थी. यानी इसके पहले अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में गिरावट करीब आठ साल पहले देखा गई थी.

असल में वह मंदी का दौर था जिसमें दुनिया भर के यात्री, कॉरपोरेट जगत के लोग, कारोबारी और अन्य लोग अपनी यात्राओं में कटौती कर रहे थे. लेकिन इसके बाद से लगातार अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ ही रही थी. NTTO का कहना है कि यह तात्कालिक गिरावट है और साल 2018 से 2022 के बीच भारतीय यात्रियों की संख्या में इजाफा होगा.

ट्रैवल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत से अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर निकलने वाले लोगों की संख्या हर साल 10 से 12 फीसदी बढ़ रही है. हाल के वर्षों में यह धारणा बनी है कि अमेरिका जाना थोड़ा कठिन हो गया है, क्योंकि कई देशों के लोगों के वहां जाने पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं. जानकारों का कहना है कि यह गलत धारणा है और अमेरिका हमेशा ही सही यात्रियों के लिए अपने दरवाजे खोलकर रखता है.

गौरतलब है कि अमेरिका आमतौर पर ज्यादातर भारतीयों को 10 से 11 हजार की फीस लेकर 10 साल के लिए टूरिटस्ट कैटेगिरी में मल्ट‍िपल एंट्री वीजा देता है. जानकारों का कहना है कि इसकी तुलना में यूरोपीय देशों का वीजा चार्ज ज्यादा है.

अमेरिका में हर साल करीब 7.7 करोड़ इंटरनेशल यात्री आते हैं. साल 2017 में इससे अमेरिका को रेकॉर्ड 251.4 अरब डॉलर की कमाई हुई थी.